वैदिक परम्परा का अगाध ज्ञान सदैव से यह निर्दिष्ट करता आया है कि चेतना ही समस्त अस्तित्व का स्रोत, मार्ग एवं लक्ष्य है। भारत के वैदिक वाङ्गमय में, इस सत्य को ब्रह्माण्ड और आत्मा दोनों का सार माना गया है। फिर भी आज के तीव्र गतिमान और बौद्धिक रूप से खंडित आधुनिक विश्व में, यह समग्र दृष्टि सामान्यता अस्पष्ट रही है, ऐसा प्रतीत होता है कि यह समय के प्रभाव से कहीं खो गई है, और अब यह एकबार फिर से जाग्रत हो रही है। सौभाग्य से सम्पूर्ण मानव जाति
के उज्जवल भविष्य के लिए पूज्य महर्षि महेश योगी जी ने इस समग्र सार्वभौमिक सत्य को प्रत्येक मनुष्य की चेतना में जाग्रत कर अनुभव एवं प्रयोग का मार्ग प्रदर्शित किया है।
यह पुस्तक परम् पूज्य महर्षि महेश योगी जी द्वारा प्रस्तुत चेतना विज्ञान के परिपेक्ष्य
में यह जानने का प्रयास करती है कि यह ज्ञान किस प्रकार गोस्वामी तुलसीदास
जी के द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस में, सुन्दर समानान्तर अभिव्यक्ति द्वारा वर्णित
किया गया है।